Monday, 31 August 2015

Django जैसे किरदारों को गढ़ने की उम्मीद हॉलीवुड फ़िल्म मेकर्स से ही की जा सकती है। वर्ना हमारे यहाँ तो 250 करोड़ लगाकर भी कटप्पा गुलाम और नीच ही रहता है। और शूद्रा जैसी फ़िल्म राइज़ से पहले सनसेट वाला फील देंती हैं। लेकिन आप फिर भी खुश रहतें हैं।

शूद्रा_the_राइजिंग फ़िल्म देखने के दौरान उसने कहा फ़िल्म को और बेहतर बनाया जा सकता था! मेरा जवाब था पहले बजट और उसके बाद सबकी अपनी-2 सोच और काम करने का तरीका होता है। तुम हॉल में बैठी ऑडियंस की तरफ देखो लगभग सभी दर्शक उसी तबके से हैं जिस तबके को केंद्र में रखकर इस फ़िल्म का निर्माण हुआ है। और यह फ़िल्म उनके लिए फ़िल्म कम उनके पूर्वजों का बीता हुआ अतीत है। जिसे ना चाहकर भी वो याद करते हुए जीते हैं। यहाँ इनके लिए फ़िल्म की इंटरटेनिग वैल्यू का कोई महत्व नहीं है। जहाँ तक मेरी बात है यहाँ मैं इस फ़िल्म की कहानी और किरदारों में वो इतिहास तलाश करने के मकसद आया था जिसे लोग स्वाभिमान और दलित अस्मिता से परिभाषित करते हैं। मुझे राइजिंग शब्द ने आकर्षित किया था। सोचा जरूर फ़िल्म का हीरो या शुद्र समुदाय स्वाभिमान के साथ राइज करता होगा और इसीलिये इस फ़िल्म का नाम शूद्रा the राइजिंग है। जहाँ तक इस फ़िल्म की बात है तो मेरी समझ से फ़िल्म की स्टोरी के मुताबिक़ इस फ़िल्म का नाम #शूद्रा_the_सनसेट होता तो बेहतर होता। आगे तुम समझ सकती हो। यह विस्मययात्मक बोध से पूछा गया सवाल मेरी सवर्ण कलीग का था। फ़िल्म बहुत ही लो बजट में स्थानीय कलाकारों को लेकर एक टारगेटेड ऑडियंस को ध्यान में रखकर बनाई गयी थी। और फ़िल्म अपनी लागत से दुगना कमाकर उतरती है यह संतोष क्या कम होगा प्रोड्यूसर के लिए। इसलिए ऐसी फ़िल्म में इंटरटेनमेंट मिले ना मिले क्या फर्क पड़ता है।

अगर इसी सन्दर्भ में हॉलीवुड की फिल्मों में सामाजिक भेदभाव, समता, स्वाभिमान और अस्मिता को पर्दे पर पेश करने की आती हो तो हॉलीवुड के लेखक निर्देशक #कैवन्टीन_टैरन्टीनो द्वारा बनाई गयी Django_Unchained को देखना जरुरी है।

2012 में रिलीज हुई #Django_Unchained उनके द्वारा लिखी निर्देशित की गयी सभी फिल्मों में पहला स्थान रखती है। जैमी फॉक्स, क्रिस्टोफर वॉल्ट, लियोनार्डो डीकैप्रियो, कैरी वाशिंगटन और सैमुअल एल जैक्सन द्वारा अभिनीत इस फ़िल्म का बजट 100 मिलियन डॉलर था। रिलीज के बाद इस फ़िल्म ने उनकी पूर्व की सभी फिल्मों की कमाई के रिकॉर्ड तोड़ते हुए वर्ल्ड वाइड 425 मिलियन से भी ज्यादा कमाए। टैरन्टीनो ने इस फ़िल्म के लिए बेस्ट ऑरिजनल स्क्रीनप्ले कैटगरी में एकेडमी अवार्ड के साथ गोल्डन ग्लोब और बाफ्टा अवार्ड पर भी कब्ज़ा किया। जैंगो एकेडमी अवार्ड के लिए पांच से ज्यादा कटैगरी में नॉमिनेट हुई। इसी फ़िल्म में क्रिस्टोफर वाल्ट्ज को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए भी एकेडमी अवार्ड मिला।

फ़िल्म की कहानी एक ऐसे प्लाट पर बुनी गयी है जिसे भारतीय परिदृश्य में रखकर Django जैसी एक नहीं दस फिल्म बनाई जा सकती हैं। बशर्ते कहानी की मूल भावना से छेड़ छाड़ ना की जाए। लेकिन यह माद्दा इंडियन फ़िल्म मेकर्स में देखने को नही मिलता जो #Quentin_Tarantino में है। शायद इसका सिंगल बड़ा कारण इंडियन फ़िल्म इंड्रस्टी में डायवर्सिटी का ना के बराबर होना है। फ़िल्म का मुख्य किरदार जैंगो (जैमी फॉक्स) और उसकी नायिका ब्रूमहिल्डा ( कैरी वाशिंगटन) काले गुलाम हैं।

1858 टेक्सस, कहानी की शुरुआत अमेरिका में गृहयुद्ध शुरू होने के दो वर्ष पूर्व की है। जंगल के रास्ते गुलामो के सौदागर कैस्पर भाई ग्रीनविल की नीलामी से कुछ गुलामो को खरीद कर अपने बागानों में काम करने के लिए ले जा रहे हैं। इस सफर के दौरान रास्ते में कैस्पर भाइयों का सामना एक जर्मन डेंटिस्ट डॉक्टर किंग शुल्ट्ज (गोरा) से होता है। शुल्ट्ज को डेंटिस्ट का पेशा छोड़े पांच वर्ष हो चुके हैं और वह अब सरकार के लिए इनामी अपराधियों को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए बाउंटी हंटर का काम करता है। डा. शुल्ट्ज को खबर लगती है की कैस्पर भाई जिन गुलामों को खरीद कर ले जा रहे है उनमे एक गुलाम ऐसा भी है जो उन इनामी बदमाशों को पहचानता है जिन्हें वो खोज रहा है। इसलिए डॉक्टर शुल्ट्ज, कैस्पर भाइयों के सामने उस गुलाम की पहचान कर उसको बेचने का आग्रह करता है लेकिन बात ना बनने पर डॉक्टर किंग दोनों भाइयों को मारकर जैंगो को उनसे आजाद करवाता है। डॉक्टर शुल्ट्ज जैंगो को अपना पार्टनर बनाता है। उन इनामी अपराधियों को पकड़ने से पहले जैंगो डॉक्टर को बताता है की उसकी शादी हो चुकी है और उसकी वाइफ को भी ग्रीनविल की नीलामी में किसी गोरे के हाथ उसके पुराने मालिक ने बेच दिया है। डॉक्टर यह जानकर उसकी वाइफ को गोरे (लियोनार्डो) से आजाद कराने के लिए एक योजना बनाते हैं। आगे आप खुद फ़िल्म देख कर पता लगाइये की आगे क्या होता है।

अगर आप अच्छे और बेहतरीन सिनेमा के दर्शक हैं तो इस फ़िल्म को देखना ना भूलियेगा। लेकिन एक बात जरूर याद रखिये जब फ़िल्म देखिये तो फ़िल्म के सभी पात्रों को भारतीय जाति व्यवस्था के सांचे में उतार कर देखियेगा। यकीनन जैंगो दलित तो केल्विन जे कैंडी जमींदार ठाकुर दिखेगा। तो केल्विन का गुलाम स्टीफन (सैमुअल) एक ऐसे गुलाम किरदार के तौर पर दिखेगा जो आपका अपना होते हुए भी अपना ना था। साथ ही जैंगो का साथी डॉक्टर वो जर्मन था इसलिए आप अपने हिसाब से सोचिये यह कौन हो सकता था।

फिलहाल #Django जैसे किरदारों को गढ़ने की उम्मीद हॉलीवुड फ़िल्म मेकर्स से ही की जा सकती है। वर्ना हमारे यहाँ तो 250 करोड़ लगाकर भी कटप्पा गुलाम और नीच ही रहता है। और शूद्रा जैसी फ़िल्म राइज़ से पहले सनसेट वाला फील देंती हैं। लेकिन आप फिर भी खुश रहतें हैं।

Monday, 20 April 2015

बेटा/बेटी यह मत करो, वो मत करो, आज तुम्हे बाहर खेलने नहीं जाना है, उन लड़को के साथ नहीं खेलना है आज स्कूल जरूर जाना है और ना जाने क्या क्या जो आपको बचपन से लेकर उम्र के उस दौर तक संस्कारो के नाम पर सलाह और नसीहतें मिलती रहती हैं जब तक आप सफलता के उस मुकाम पर ना पहुँच जाएँ जहाँ आपके परिजन आपको देखना चाहतें हो। लेकिन हमें तो अपने परिजनों/गुरुजनों की बताई उनकी तानाशाही लगती हैं लेकिन जब कभी भी आप जिंदगी में फेल होते हैं तो आपको सबसे पहले अपने परिजनों और गुरुजनों की ही याद आती है और सोचते हैं की काश हमने अपने परिजनों की कही बातों पर अमल किया होता तो हमें फेल ना होना पड़ता। इसीलिये जिंदगी के इम्तिहानों को पास करने में हमें हमारे महापुरुषों, परिजनों और गुरुजनो की उन बातों को अपने चरित्र में जरूर उतारना चाहिए जो कभी आपको उनकी तानाशाही लगती हो।